अखण्ड ब्रह्माण्डनायक योगेश्वर श्रीकृष्ण व ब्रज की रानी राजराजेशवरी श्रीराधा जी की नित्य क्रीडास्थली एवं माँ यमुना के पावन पुलिन तट पर सन््तों की समाराधना स्थली ‘ धन्यं वृन्दावनम् तेन भक्ति नृत्यति यत्र च’। श्री धाम वृन्दावन में छात्रों के सर्वांगीण व्यक्तिगत विकास एवं आधुनिक वैदिक परम्परानुवर्तक ज्योतिष, कम्प्यूटर, भागवत , कर्मकाण्ड व उ.प्र. माध्यमिक संस्कृत शिक्षा परिषद् लखनऊ द्वारा संचालित प्रथमा (कक्षा 6) से उत्तर मध्यमा (कक्षा 12) तक की शिक्षा का केन्द्र श्री भक्ति संस्कृत उ.मा. विद्यालय की स्थापना सन् 1926-27 में हुईं। संस्थापक परम वैष्णव कामिनी कुमार घोष (राधेश्याम बाबा) जी महाराज द्वारा वर्ष 1947 में उ.प्र. शासन द्वारा स्थायी मान्यता हुई।
शासन द्वारा वित्त पोषित वर्ष 1972 से संचालित है। वर्तमान में यह ब्रज क्षेत्र का ही नहीं अपितु आगरा मण्डल की संस्कृत प्रतियोगिताओं में प्रथम स्थान विजयेता टीम का नेतृत्व करने वाला बैदिक शिक्षा जगत में उत्तरोत्तर विकास के पथ पर सतत् प्रयासरत् है। सुयोग्य अध्यापकों व पूज्य गुरूदेव आ.पं.श्रीमोहन लाल जी गौड़ के कुशल निर्देशन में माँ सरस्वती
का आशीर्वाद ग्रहण करते हुए छात्र अध्ययनरत् हैं। “
संस्थापक परम वैष्णव कामिनी कुमार घोष (राधेश्याम बाबा) जी
शुभकामनाओं के साथआपका शुभेच्छ
शुकाचार्य पीठाधीश
आचार्य रमेश चन्द्र शर्मा ‘विधि शास्त्री ‘
(कार्यकारिणी प्रबन्धक- संचालक)
श्री श्री भक्ति प्रचारिणी सभा कल सोसायटी वृन्दावन के द्वारा संचालित श्री भक्ति संस्कृत उ.मा. विद्यालय जिसका कि वैदिक सनातनी संस्कृति व संस्कृत भाषा के ॥ प्रचार प्रसारच शिक्षा के क्षेत्र में अपने अंचल में एक अग्रणीय भूमिका है।
इस विद्यालय का विगत 95 वर्षो से एक गौरवशाली इतिहास चला आ रहा है।
कुशल शिक्षकों का संस्कृत भाषा के पठन-पाठन अति आधुनिक विषयों तथा समाजिक व सांस्कृतिक एवं आवश्यक शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान है तथा महत्वपूर्ण भूमिका चली आ रही है।
वर्तमान में इस विद्यालय का आंचलिक ही नहीं अपितु प्रादेशिक स्तर एक (कार्यकारिणी प्रबन्धक- संचालक)
सम्मानित एवं अग्रणीय स्थान है कुशल निर्देशन योग्य शिक्षकों का पूर्ण समर्पण इस विद्यालय को निरन्तर प्रगति पथ पर अग्रसारित करते हुए विद्यार्थियों के उन्नत भविष्य के लिए पूर्ण रूप से समर्पित है।
मोहन लाल गौड़
(प्रधानाचार्य)
हमारा प्रयास भारतीय वैदिक परम्परा ऋषि परम्परा को जीवन्त रखते हुए आधुनिक समय में संस्कृत भाषा को शैक्षिक जगत की नई ऊचाईयों के लिए सतत् प्रयास है। संस्कृत भाषा देव भाषा ही नहीं अपितु वैदिक व अन्य सभी भाषाओं की जननी है। अपनी जगत जननी भाषा के सर्वांगीण विकास हेतु हम कृत संकल्पित हैं। जिस भाषा से संस्कारों का जन्म
होता है।
संस्कृत शब्द ‘सम’ उपसर्ग पूर्व ‘कृ’ धातु से कत प्रत्यय करने पर बनता है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है शुद्ध, पवित्र, संस्कारवान परिमार्जित, परिष्कृत, साफ-सुथरा,, शिष्ट
आदि।
वर्तमान में प्राप्त सबसे प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ ऋग्वेद है। संस्कृत का पुराना नाम था गीर्वाणभाषा है। पाणिनी के पूर्व के साहित्य को वैदिक संस्कृत और बाद के साहित्य को लौकिक प्रधानाचार्य संस्कृत कहते हैं।
वर्तमान की पीढ़ी जो संस्कृत के ज्ञान को भुलाने की प्रवृति में है उसको जीवन्त कर छात्रों को संस्कारवान है वर्तमान समय में जीवन जीने की कला का अभ्यास कराते हुए शैक्षिक जगत की सर्वोच्च सीढ़ी तक पहुँचाने का प्रय
प्रत्येक वर्ष किया जा रहा है। हम इसी संकल्प के साथ प्रयासरत् हैं।
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